Saturday, November 25, 2006

अद्भूत और आश्चर्यजनक यात्रा

प्रकृति की गोद में बसा छत्तीसगढ़ प्राचीन सम्राटों एवं राजाओं का केन्द्र स्थल होने के कारण ऐतिहासिक-धार्मिक-स्थलों से परिपूर्ण है। महानदी, शिवनाथ, अरपा, खारून, पैरी, मांड, ईब, इंद्रवती,शबरी,गोदावरी, लीलागर, सोन और नर्मदा के पावन तटों पर कई राजवंशों एवं सम्प्रदायों का उदय और अस्त हुआ। इसके फलस्वरुप उनके अवशेष किले, राज-प्रसादों, मंदिरों, चैत्यों आश्रमों के गौरवमय अतीत की समृतियां शेष है। प्रकृति के अद्भूत नज़ारे और प्राचीन इतिहास पुरात्व की अमर कहानी अमिट अक्षरों में अंकित है। प्रकृति और मानव दोनों के सृजन से छत्तीसगढ़ अद्भूत- आश्चर्यजनक तथ्यों को समेटे हुए हैं । इस तथ्यों के आधार पर छत्तीसगढ़ को पर्यटन का गढ़ कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

छत्तीसगढ़ प्रदेश के शिल्पियों का स्थापत्य-ज्ञान शिल्प नैपुण्य, सौंदर्यबोध और सृजन प्रतिभा विस्मित करती है। कला और संस्कृति का अटूट संबंध है। दोनों के गठजोड़ से स्वरूप सुषमा निखरती है। छत्तीसगढ़ के खंडहर विगत गौरव की कथा के साक्ष्य हैं। प्रदेश के बस्तर ,बिलासपुर, कांकेर, सरगुजा आदि जिलों के उत्खनन और खोज से प्रागैतिहासिक सभ्यता के अवशेष मिले हैं । रायगढ़ के पास कबरा पहाड़ की गुफाओं और सरगुजा के निकट रामगढ़ की गुफाओं से मिले सैलचित्र आदिम एवं सुविकसित संस्कृति की धरोहर है। प्राचीन दण्डकारण्य का अधिकांश भाग बस्तर है यहां वनवास काल में भगवान श्रीराम आए थे। महर्षि अगस्त्य का आश्रम यहीं है। ऋषि-मुनियों की साधना भूमि और विविध प्रतापी नरेशों की कर्मभूमि ने महत्वपूर्ण स्मारकों की सृष्टि हुई । महानदी के तट पर बसा सिरपुर नगरी कभी इस प्रदेश दक्षिण कोसल की राजधानी थी। यहां सातवीं शताब्दी का ईंटों से निर्मित प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर अपने शिल्प वैभव के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। सिरपुर का पुरातन नाम श्रीपुर था जिसका अर्थ है समृद्धि की नगरी । सातवीं सदी में चीनी यात्री व्हेनसांग यहां आया था। कहते हैं कि उस समय करीब दस हजार बौद्ध भिक्षु यहां शिक्षा ग्रहण करते थे। यहां बौद्ध विहार, आनंद प्रभु कुटीर, स्वस्तिक विहार दर्शनीय स्थल है । यहां भगवान बुद्ध की अद्भुत प्रतिमाएं प्रस्थापित है। सिरपुर में गंधेश्वर मंदिर के साथ ही अब कई समाजों ने अपने धर्मस्थल स्थापित किए हैं।

छत्तीसगढ़ का प्रयाग राजिम जीवनदायिनी महानदी-पैरी और सांदूर नदियों के त्रिवेणी संगम पर बसा है। प्रसिद्ध राजीव लोचन मंदिर के साथ ही कुलेश्वर महादेव मंदिर प्रसिद्ध है। राजिम से दस किलोमिटर दूर चम्पाचरण वल्लभ सम्प्रदाय के पर्व तक प्रभु वल्लभाचार्य की जन्म स्थली है । यहां चम्पकेश्वर महादेव ज्योतिर्लिंग भी स्थापित है। रायपुर से 35किलोमीटर दूर आरंग में प्रसिद्ध जैन मंदिर भांड-देवल में तीर्थंकर शांतिनाथ, श्रेयांसनाथ और अनंतनाथ की विशालकाय प्रतिमा अद्भूत है। राजिम की ही तरह जांजगीर-चांपा जिले का शिवरीनारायण महानदी शिवनाथ और जोक नदी के संगम पर बसा है। माना जाता है कि भगवान राम ने यहां शबरी के झूठे बेर खाये थे। यहां का जगन्नाथ मंदिर प्रसिद्ध है। शिवरीनारायण से तीन किलोमीटर पूर्व ग्राम खरौद में लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर इतिहास की धरोहर है। कहते हैं भगवान राम ने इस स्थान में खर और दूषण नाम के असूरों का वध किया था।

प्रदेश का बिलासपुर जिला संस्कारधानी के तौर पर प्रसिद्ध है। जिला मुख्यालय से बीस किलोमीटर दूर स्थित रतनपुर को छत्तीसगढ़ की प्रथम राजधानी का गौरव प्राप्त है। रतनपुर में प्रसिद्ध महामाया मंदिर, कण्ठीदेवल, लखनीदेवी मंदिर के साथ ही प्राचीन किला रामदेकरी व गिरजाबंद दर्शनी स्थल है। रतनपुर से दस किलोमीटर दूर खूंटाघाट जलाशय और बत्तीस किलोमीटर दूर ग्राम लुथरा में सैय्यद इंसान अली की दरगाह सभी धर्मावलम्बियों की आस्था का केन्द्र है। इसीत रह मल्हार के बुढ़ीखार में जैन तीर्थंकर आदिनाथ स्वामी परगनिया देवता के रूप में गांव वालों द्वारा पूजित है। आदिनाथ भगवान की तेरह फीट ऊंची विशाल प्रतिमा के साथ ही गाँव के रास्ते पर भगवान बुद्ध अड़ियल देवता के नाम से विराजमान है। मल्हार में पातालेश्वर मंदिर देऊर मंदिर और डिण्डेश्वरी देवी का मंदिर दर्शनीय स्थल है।

धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला बस्तर आदिवासी संस्कृति और हस्तशिल्प के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है यहां पहाड़ी गुफाओं और जल प्रपातों की लंबी श्रृंखला है। अंधी मछलियों के लिए प्रसिद्ध कुटुमसर गुफा तिलस्म का संसार है। अरण्यक गुफा, कैलाश गुफा, मकर गुफा, मरप गुफा और कनक गुफा प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। एशिया का नियाग्रा नाम से विख्यात चित्रकोट जलप्रपात इन्द्रावती नदी के घाटी में गिरने से बना है । इसी तरह कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में स्थित तीरथगढ़ जलप्रपात बेहद सुंदर है। दन्तेश्वरी में देव्तेश्वरी माई का मंदिर और बारसुर में भगवान गणेश की विशाव मूर्ति अद्भुत है।

छत्तीसगढ़ के दूसरे छोर उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र सरगुजा, कोरिया, रायगढ़ और जशपुर जिले भी जंगल, पहाड़, नदी और जलप्रपातों से सुसज्जित है। रंग शाला के रूप में विख्यात रामगढ़ की गुफायें है। यहां माना जाता है कि कालीदास ने मेघदूत की रचना की थी । रामगढ़ पहाड़ी पर अवस्थित गुफाओं में सम्राट अशोक के काल में लिखित रूप दक्ष और देवदासी सुतनुका प्रेम कथा प्रस्तर खंड में अमर है। विश्व की प्राचीनतम रंगशाला सीता बोंगरा के नाम से प्रसिद्ध है। वहीं कैलाश गुफा, उदयगिरी, कबरापहाड़, सिंघनपुर, ओंगना, बलसदा जैसे पुरातात्विक स्थल है। इस क्षेत्र में रानीदाह और राम झरना जैसे मनोरम जलप्रपात है तो मैनपाट को छत्तीसगढ़ का शिमला भी कहा जाता है जहां बड़ी संख्या में तिब्बती रहते हैं।

छत्तीसगढ़ शैव-वैष्णव-बौद्ध और जैन धर्मों का संगम स्थल है। यहां सदियों पुरानी प्रतिमायें छत्तीसगढ़ के गौरव की साक्षी है। इसी तरह बिलासपुर जिले के मनियारी नदी के तट पर बसे तालाग्राम में देवरानी जेठानी का मंदिर और रूद्रशिव की प्रतिमा जिसके शरीर के अंगों पर जानवरों की आकृतियों विभूषित हैं कई रहस्यों को समेटे हुए है। छत्तीसगढ़ के खजुराहों भोरमदेव कामंदिर अद्भूत मादकता और माधुर्य से देखने वालों का मन मोह लेता है। दुर्ग जिले के प्राचीन शिव मंदिर देव बलौदा और नागपुरा के सात ही राजनांदगांव के गंडई शिवमंदिर का शिल्प और स्थापत्य कला अनूठी है। नगपुरा में जैन तीर्थकंर पार्श्वनाथ की पूजा नाग देवता के रूप में की जाती है। वहीं डोंगरगढ़ पहाड़ी पर मां बम्लेश्वरी मंदिर की महिमा ही निराली है। धमधा में आदिवासियों के आराध्य बुढ़ादेव का मंदिर है तो झलमला में गंगा मैय्या का । नैसर्गिक और प्राकृतिक कौमार्य छत्तीसगढ़ का आकर्षक पहलू है। पाषाण संस्कृति के साथ ही मानव उत्थान के पद चिन्ह यहां मौजूद है ।
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